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शेरो शायरी

अधीर मन……

मन अधीर है क्युं?
किस संताप से घिरे हैं?
असंतोष की स्याह रेखा,
चेहरे पर उमड़े हैं!
कुछ न करने से अच्छा,
कि कुछ किया जाय,
परिणाम की व्यर्थ चिंता में,
क्युं आप पड़े हैं?

ये अनर्गल प्रलाप किस लिए?
उर में द्वेष-ताप किस लिए?
जो प्राप्त वही पर्याप्त है,
ये अधिक लाभ किस लिए?
जिंदगी जहां ले जाए,
गुनगुनाते हुए चले जाईए,
उस पथ से घृणा क्युं?
जहाँ आप खड़े हैं?

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मेरी ख़ता है क्या…..

तेरा एक दीदार पाकर हम सुलग उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या,
तू मुस्कुराए और मिरे रूह तड़प उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या!

एक तो संग’मरमर के मा’फिक़ बदन उसपर ये ख़ास पैरहन,
हम इस गुलफ़ाम बदन पे फिसल उठें इसमें मेरी ख़ता है क्या!

वो शख़्स जो तेरे करीब है कैसे काबू करता होगा खुद पर जां,
हम तो सिर्फ़ तुम्हें देखकर सिहर उठे इसमें मेरी ख़ता है क्या?

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गिरा तो सही…..

इस बेक़रार दिल पे कुछ यूँ कहर ढा तो सही,
ऐ सनम इन रस भरी होंठों से पिला तो सही!

इक जमाने से ये जिस्म सूखकर बेजां पड़े हैं,
मुझे तेरी बर’सात में मुकम्मल भिगा तो सही!

रुख़’सार शर्म से सुर्ख़, नि’गाहें झुकी रहे क्युं,
ऐ जान सिर्फ़ इक दफ़ा नजरें मिला तो सही!

उंगलियों से जुल्फ़ों को यूँ न पे’शानी से हटा,
ताउम्र इसी अंदाज में बिजली गिरा तो सही!

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तमाशा बना देंगे…..

दिल की बात यूँ बताओगे तो लोग तमाशा बना देंगे,
उलझने जुबां पर लाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

ग़म है भी ग़र तो किसी कोने में दफ़्न कर लेना तुम,
ऐसे सरे-आम दिखाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

खुद पे क्या गुजरी ये बात खुद तक रहे तो ठीक है,
सभी को हाल सुनाओगे तो लोग त’माशा बना देंगे!

बिखरने को जी करे तो अकेले में ही बिखरना दोस्त,
हुजूम में बिखर जाओगे तो लोग तमाशा बना देंगे!

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ख़ता मुझसे……

मुझे ब’दस्तूर न ढूढ़े तेरी आँखें अब रहे ख़फा मुझसे,
तू फ़क्त़ ये तो बता स’नम कि हुई क्या ख़ता मुझसे!

अदा-ए-नजऱ’अंदाज नये-नये कहाँ से सीखे तूमने,
जफ़ा इस’कदर जारी है कि न हो सके
बयां मुझसे!

तूने आ’ईना दिखा दिया, कि मैं क्या हूँ तेरी नज़र में,
अब तो गिरके टूट जाया करते हैं हर आईना मुझसे!